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Wednesday, 27 April 2016

दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई जा रही किताब में शहीद भगत सिंह को कथित रूप से 'क्रांतिकारी आतंकवादी' बताने का मुद्दा बुधवार को लोकसभा में उठा।

दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई जा रही किताब में शहीद भगत सिंह को कथित रूप से 'क्रांतिकारी आतंकवादी' बताने का मुद्दा बुधवार को लोकसभा में उठा । बता दें इस किताब के लेखक विपिन चंद्र और मृदुला मुखर्जी हैं।

लोकसभा में शून्यकाल के दौरान भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने यह मामला उठाया। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने अपने शासनकाल के दौरान देश की शिक्षा को खत्म करने और इतिहास को तोड़ने मरोड़ने का प्रयास किया है। इसके लिए देश उसे कभी माफ नहीं करेगा। कांग्रेस सदस्यों के विरोध के बीच ठाकुर ने कहा कि इस पुस्तक के लेखकों में से एक मृदुला मुखर्जी के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं की जांच चल रही है।

ठाकुर ने कहा, 'इंडियाज स्ट्रगल फार इंडीपेंडेंस' के 20वें अध्याय में भगत सिंह को क्रांतिकारी आतंकवादी बताया जाना बेहद आपत्तिजनक है। उससे भी आपत्तिजनक कथित दो विचारधाराओं के नाम पर इसको विश्वविद्यालय में पढ़ाया जाना है। उन्होंने कहा, संघीय लोकसेवा की परीक्षा में भी भगत सिंह के 'क्रांतिकारी आतंकवाद' पर सवाल किया गया था। ठाकुर ने जोर देकर कहा कि इस बात पर बहस होनी चाहिए कि पाठ्यपुस्तकों में क्या पढ़ाया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि इस पुस्तक में भगत सिंह के अलावा, चिटगांव आंदोलन के नेता सूर्यसेन और चंद्रशेखर आजाद को भी क्रांतिकारी आतंकवादी कहा गया है।

परिवार ने भी जताया विरोध


भगत सिंह के परिजनों ने भी उन्हें क्रांतिकारी आतंकवादी बताए जाने पर नाराजगी जताई है। उन्होंने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप करने और तथ्यों को सुधारने की मांग की है। परिवार के कुछ सदस्य बुधवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश त्यागी से भी मिले। त्यागी ने इस मामले पर गंभीरता से विचार करने का आश्वासन दिया।

गृह मंत्रालय भी नहीं मानता शहीद


अगस्त 2013 में गृहमंत्रालय ने सूचना के अधिकार के तहत दिए जवाब में कहा कि ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है, जिसमें भगत सिंह को शहीद घोषित किया गया हो।

पाकिस्तान में चल रही सुनवाई


लाहौर हाईकोर्ट के फैसले के बाद भगत सिंह को 1931 में फांसी दी गई थी। वर्ष 2013 में वकील इम्तियाज राशिद कुरैशी ने याचिका दायर कर इस फैसले को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि जिस जज ने यह फैसला सुनाया उसे इसका अधिकार ही नहीं था। जनवरी 2016 में मुख्य न्यायाधीश इजाजुल अहसान ने मामले की दोबारा सुनवाई के लिए जस्टिस खालिद महमूद खान के नेतृत्व में पीठ गठित की।

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