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Sunday, 9 October 2016

इश्लाम किसी के बनाए संविधान से नहीं चलेगा , मुसलमानों के लिए कुरान और हदीस ही सबसे बड़ा संविधान : जमीअत उलेमा-ए-हिंद


जमीअत उलेमा हिंद के अध्यक्ष ने इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि तीन तलाक और विवाह के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा प्रदान की गई राय अस्वीकार्य है और जमीअत उलमा हिंद ईसकी न केवल सख्त निंदा करता है बल्कि इसका पुरजोर विरोध भी करेगा .


उन्होंने कहा कि मुसलमानों के लिए कुरान और हदीस ही सबसे बड़ा संविधान है और धार्मिक मामलों में व्यवस्था ही प्रासंगिक है जिसमें क़यामत कोई संशोधन संभव नहीं और सामाजिक सुधारों के नाम पर व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश इस हलफनामे में कहा गया है कि ” पर्सनल ला के आधार पर मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकार नहीं छीने जा सकते और इस धर्मनिरपेक्ष देश में तीन तलाक के लिए कोई जगह नहीं है । ”

मौलाना सैयद अरशद मदनी ने कहा कि जमीअत उलेमा हिंद सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष स्पष्ट कर चुकी है कि मुसलमानों के धार्मिक मामलों कुरान और हदीस के आधार पर तय होते हैं एवं सामाजिक सुधारों के लिए व्यवस्था को फिर से नहीं लिखा जा सकता है और न ही रहती दुनिया तक इसमें कोई संशोधन ही संभव है।
धर्म के मामले में मुसलमानों के लिए कुरान और हदीस के अलावा और कोई नियम नहीं है। जमीअत बतौर पक्ष इस बात को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने रखेगी।

मौलाना मदनी ने कहा कि अदालत ने इस मामले में जनता से राय मांगी है इसलिए सभी मुसलमान पुरुषों और महिलाओं से अपील करूंगा कि वे विधि आयोग के सामने अपनी राय पेश करें।

हमें उम्मीद है कि 99 प्रतिशत मुसलमान मर्द महिलाओं शरीयत के अनुसार तीन तलाक और वैवाहिक दोनों के पक्ष में अपनी राय देंगे क्योंकि शादी हो या तलाक मुसलमान कुरान और शरीयत से हरगिज़ नहीं हट सकते।

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