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Friday, 21 October 2016

शाहबानो केस : 62 वर्षीय 5 बच्चों की माँ "शाहबानो" को सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी अपने पति से हर्जाना इसलिए नहीं मिला , कारण : कांग्रेस और कट्ठ्मुल्लों की यारी , पूरी स्टोरी ....

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धर्म के राजनीति पर असर का एक बडा़ उदाहरण शाहबानो केस है :
मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली पांच बच्चों की मां शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी अपने पति से हर्जाना नहीं मिल सका. कारण था मुस्लिम मामलों को लेकर हुई राजनीति.

शाहबानो प्रकरण भारत में राजनीतिक विवाद को जन्म देने के लिये कुख्यात है।
शायद आपको इस केस के बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी.अपनी किस्म का यह वाहिद ऐसा केस है जहाँ सत्तापक्ष ने उच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय को संविधान-संशोधन द्वारा चुटकियों में बदलवा दिया. इसको अक्सर राजनैतिक लाभ के लिये अल्पसंख्यक वोट बैंक के तुष्टीकरण के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

शाहबानो एक ६२ वर्षीय मुसलमान महिला और पाँच बच्चों की माँ थीं जिन्हें १९७८ में उनके पति ने तालाक दे दिया था।

“हुआ यूँ था कि शाहबानो नाम की एक मुस्लिम औरत को उसके शौहर ने 3 बार ‘तलाक़’ ‘तलाक़’ ‘तलाक़’ कहके उससे पिंड छुड़ा लिया था।शाहबानो ने अपने मियाँ जी को घसीट लिया कोर्ट में।ऐसे कैसे तलाक़ दोगे? खर्चा-वर्चा दो। गुज़ारा भत्ता दो। मियाँजी बोले काहे का खर्चा बे? शरीयत में जो लिखा है उस हिसाब से ये लो 100 रु० मेहर की रकम के और चलती बनो।शाहबानो बोली ठहर तुझे मैं अभी बताती हूँ और बीबी यानी शाहबानो कोर्ट  में चली गयी। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक चला गया और अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो के हक़ में फैसला सुनाते हुए उनके शौहर को हुक्म दिया कि अपनी बीवी को वे गुज़ारा भत्ता दें। यह सचमुच एक ऐतिहासिक और ज़ोरदार फैसला था।

करीब 25 साल पहले सुप्रीमकोर्ट ने एक तलाक़शुदा 62 साल की बूढ़ी महिला को गुजारा भत्ता देने की ईमानदार कोशिश किया था, उस समय काँग्रेस इस मामले में पूरी निर्लज्जता से मुस्लिम कठमुल्लावाद के समर्थन मे उतर गई थी । आज की तरह उस समय भी इस्लाम खतरे मे आ गया था ।

शाहबानो केस के रूप मे कुख्यात यह मामला मुस्लिम तुष्टीकरण और कठमुल्लावाद को कोंग्रेसी समर्थन की कहानी के रूप आज भी याद की जाती है । जिसने मुस्लिम कट्टरपंथियों को संतुष्ट करने के लिए हिंदुस्तान के संविधान, कानून, न्यायपालिका और संसद सबको अपमानित किया ।

जिससे की बेचारी वृद्ध महिला को दो रोटी के लाले पड़ जाते हैं । बेचारी महिला तमाम मुल्ला-मौलनाओं के दरवाजों पर जाकर गिड़गिड़ाती है कि उसे अपने खर्च लायक भत्ता दिलवा दे कोई । परन्तु मुल्लों ने उसे टका सा जबाब दिया कि ..... इस्लामी कानून के अनुसार गुजारा भत्ता केवल "इद्दत की मियाद" तक ही होता है, उसके बाद हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं।

हर जगह से धक्के खा शाहबानो नयायालय के पास गुहार लगाती है । निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक शाहबानो जीतती गयी और उसका अमीर पति हर बार ऊपरी आदालत मे अपील करता रहा । आखिर मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट और यहाँ भी जजमेंट शाहबानो के ही पक्ष मे आया । सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर शाहबानो के पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया ।

बस इसी बात पर कठमुल्लों को मिर्ची लग गयी । इस्लामिक कानून मे सरकारी-अदालती हस्तक्षेप बता इसका जमकर बिरोध किया । "इस्लाम खतरे में है" के नारे लगाये जाने लगे ...... न्यायाधीशों के पुतले जलाये जाने लगे । ओबैदुल्ला खाँ आजमी और सैयद शहाबुद्दीन जैसे कठमुल्लों ने तत्काल All India Muslim Personal Law Board का गठन कर डाला और ‘इस्लाम बचाने’ के कार्य में जुट गये।

यह बात 1986 की है..... केन्द्र मे सरकार पर काबिज थी काँग्रेस । पूर्ण बहुमत प्राप्त राजीव गांधी की सरकार उस समय दोनों सदनों मे "पूर्ण बहुमत" मे थी । राजीव गांधी की सरकार मुस्लिम वोट बैंक हड़पने के लिये इतना गिर गई की उन्होने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिये संविधान मे ही परिवर्तन करने का फैसला किया ।

1986 के इस बेहद विवादित मामले में राजीव गांधी की तत्कालीन केंद्र सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम पारित कर मोहम्मद खान बनाम शाहबानो मामले में सर्वोच्च अदालत द्वारा 23 अप्रैल, 1985 को दिए फैसले को पलट दिया था. 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया.राहुल गांधी के अब्बा ने रात भर संसद चलवाई थी इस चक्कर में.... राजीव गांधी ने इस केस का फैसला शाहबानो के पक्ष में आने के बाद संसद में वो कानून ही बदलवा दिया था, मुस्लिमों को खुश करने के लिए।और शाहबानो को मिला हुआ इन्साफ नहीं मिल सका।

जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने तब अपने फैसले में कहा था कि अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125, जो परित्यक्त या तलाकशुदा महिला को पति से गुजारा भत्ता का हकदार कहता है, मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है क्योंकि सीआरपीसी की धारा 125 और मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों में कोई विरोधाभास नहीं है. (हालांकि बिल पारित होने के बाद हिंदूवादी संगठनों ने राजीव गांधी पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाया था.)
कोंग्रेसियों ने एक ऐसा कानून पास किया जिसने शाह बानो जैसी सभी तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं को हमेशा हमेशा के लिये "गुजारा भत्ता" से वंचित कर दिया ।

और मजे की बात शाहबानो केस में उस समय SC के फैसले को संसद में बदल दिया गया था तब सिर्फ आरिफ मोहम्मद खान ने सरकार का विरोध किया था । जिसके बाद कांग्रेस ने उनसे किनारा कर लिया था ।आज आरिफ कँहा है ?? किसी को नहीं पता शायद वो हासिये में कंही पड़े अपनी बेबाकी का गुनाह भुगत रहे होंगे ।
और उससे ज्यादा मजे की बात -

हबीबुल्लाह उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में निदेशक के पद पर नियुक्त थे और अल्पसंख्यक मुद्दों को देखते थे.समाचार-पत्र 'द हिंदू' में प्रकाशित अपने स्तंभ में हबीबुल्लाह ने कहा है, "मैंने अपनी मेज पर ऐसी याचिकाओं और पत्रों का अंबार पड़ा पाया, जिसमें अदालत के फैसले की आलोचना की गई थी और सरकार से हस्तक्षेप कर अदालत का फैसला पलटने की मांग की गई थी." वह आगे लिखते हैं, "तब मैंने सुझाव दिया था कि हर याचिकाकर्ता से कहा जाए कि वे सर्वोच्च न्यायालय में समीक्षा याचिका दायर करें. एक बार तो ऐसा लगा कि मेरा सुझाव मान लिया गया, हालांकि मुझे कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली."

हबीबुल्ला आगे कहते हैं, "तभी एक दिन जब मैंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के चेंबर में प्रवेश किया तो वह राजीव गांधी के सामने  एमजे अकबर ( पहले कांग्रेस में थे, अब Narendra Modi  सरकार में मंत्री हैं एमजे अकबर उल्लेखनीय है कि पत्रकारिता से राजनीति में आए एमजे अकबर 1989-91 में बिहार के किशनगंज से कांग्रेस सांसद चुने गए थे. वह कांग्रेस के आधिकारिक प्रवक्ता भी रह चुके हैं ) को बैठा पाया. मैंने देखा कि अकबर, राजीव गांधी इस पर राजी कर ले गए थे कि यदि केंद्र सरकार शाहबानो मामले में हस्तक्षेप नहीं करती है तो पूरे देश में ऐसा संदेश जाएगा कि प्रधानमंत्री मुस्लिम समुदाय को अपना नहीं मानते." केंद्र सरकार में विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर ही वो शख्स थे जो शाहबानो मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलकर अदालत का फैसला पलटवा चुके थे .

राजीव गांधी सरकार द्वारा तब कानून में किए गए बदलाव को कांग्रेस पार्टी की आधुनिक विचारधारा में पतन के तौर पर देखा गया था.राजीव सरकार के इसी फैसले को लेकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब ‘द टर्बुलेंट इयर्स :1980-1996’ में लिखा है कि इस मामले में राजीव के फैसले से उनकी आधुनिक छवि पर गहरा धक्का लगा था.

खैर - मुस्लिम धर्मगुरुओं को पारिवारिक और धार्मिक मामलों में अदालत का दख़ल मुस्लिम अधिकारों के लिए खतरा लगा.किसी ने भी यह पूछने की हिम्मत नहीं की कि यह कैसा मजहब है, जो एक बूढ़ी महिला को गुजारा भत्ता देने मात्र से खतरे में पड़ जाती है ?
जरा ये बताओ कौन सा इस्लाम किसी बूढ़ी औरत को उसके गुजारे भत्ते से वंचित रखता हैं ?? जब क़ाज़ी निकाह पढ़ाते हैं तो उसमे दवा बीमारी सारे हर्जे खर्चे के लिए तो क़बूल करवाता हैं तो फिर शाहबानो के शौहर मुहम्मद अहमद खान से क्या क़बूल करवाया था की तलाक देकर बुढ़ापे में घर से बाहर कर देना ?? और हर्जा खर्च भी मत देना ??

आप लोगो ने तो गर्त में धकेल दिया इस्लाम को मौलाना।
राजीव गांधी जिनको हम भारत में कंप्यूटर क्रंति के जनक कहते हैं और युवा के आइडल के रूप मानते थे। वो तो युवाओ के आइडल हो ही नही सकते क्यूंकि जो नेता कट्टरपंथियों के आगे झुक गया जाये वो युवाओं का क्या मार्गदर्शन करेगा ??

वोटबैंक के सौदागरों ने तब भी एक मुस्लिम महिला का दर्द नहीं समझा था, तो आज क्या समझेगी ? नारी की अस्मिता,आत्म-निर्भरता,स्वतंत्रता और सशक्तीकरण का दम भरने वाले राजपक्ष ने कैसे वोटों की खातिर(राजनीतिक लाभ के लिए) देश की सब से बड़ी अदालत को नीचा दिखाया,यह इस प्रकरण से जुडी बातों से स्पष्ट होता है.

62 साल की एक बेसहारा वृद्धा घुट घुट कर जीने को मजबूर थी पर काँग्रेस ने मुस्लिम वोट से अपनी झोली भर ली । आज भी जब ट्रिपल तलाक, 4 बीबियों और निकाह हलाला जैसे इस्लामिक रिवाजों से महिलाओं को सताया जा रहा है तो नीच सेक्युलरों का ब्यवहार "शाहबानो केस" की तरह ही है ..तमाम धर्म मे नारी अधिकार नयायालय द्वारा सुरक्षित हैं, और पति-पत्नी को तलाक ग्रांट करने से पहले 1 साल से लेकर 2 साल तक का समय आपसी सुलह के लिए देती है जबकि शरीयत कानून सिर्फ ट्रिपल तलाक बोलते ही नारी को बेघर-बेसहारा कर देती है ।

हमारा बिरोध उस "इस्लामिक कानून" से है जो पति-पत्नी के बीच आपसी सुलह की जगह "निकाह हलाला" द्वारा औरत को वेश्या बना देती है इसलिए तमाम राजनीतिक दल .... समाज ... मानवतावादी ... महिलावादी इस मुद्दे को वोटबैंक के चश्मे से देखना छोड़ "नारी सम्मान" के लिये एकजुट खड़े हो ।

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