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Friday, 4 November 2016

वरिष्ठ पत्रकार "रविश कुमार" के नाम कनिष्ठ पत्रकार "अमित कुमार शुक्ला" का पत्र , और ABT का जनता से प्रश्न , क्या NDTV का प्रसारण लाइसेंस रद्द होना चाहिए ?

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आदरणीय रवीश कुमार जी ,

अपने मन की पीड़ा व्यक्त करने के लिए आज कल आप पत्र व्यवहार का सहारा ले रहे हैं | इसलिए अपने मन की पीड़ा को आप तक पहुंचाने के लिए मैं भी इसी माध्यम का ही सहारा ले रहा हूं | हाल ही में एमजे अकबर जी को लिखे पत्र में आपने सोशल मीडिया पर आपके प्रति और आपके परिवार के प्रति लिखे जा रहे अपशब्दों का ज़िक्र किया | तक़लीफ़ हुई ये जानकर कि लोग आपकी मां को गाली दे रहे हैं | ये कतई भी उचित नहीं है कि,  आपकी अंधविरोधी और किसी की अंधभक्ति वाली पत्रकारिता के लिए कोई आपकी या फिर उसकी मां को अपशब्द कहे | लेकिन इतना तो आप भी जानते हैं सर, कि पुरुष प्रधान समाज ने शब्दों के माध्यम से अपने क्रोध को व्यक्त करने की जो व्यवस्था बनाई है | उसमें सारी गालियां माताओं और बहनों को ध्यान में रखकर ही बनाई गई हैं | लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि मैं इस व्यवस्था का समर्थक हूं | लेकिन हां जब कई बार बड़े शहरों में माताओं और बहनों को भी इसी व्यवस्था का हिस्सा बनकर “MC.. BC” बोलते हुए देखता और सुनता हूं | तो गाली देने के आदी हो चुके पुरुषों की दुविधा को समझ पाता हूं |

लेकिन सर मेरा मानना है कि मीडिया के आप जैसे महापुरुषों को इस दिशा में भी कुछ काम करना चाहिए | और पुरुषकेंद्रित कुछ गालियों का श्रृजन करना चाहिए | खैर मुझे लगता है मेरी लेखनी मन की मुख्य पीड़ा से भटक रही है | इसलिए अपनी मूल पीड़ा पर ही फोकस करता हूं | सर सोशल मीडिया पर दलाल कहे जाने पर आपको पीड़ा हुई | होनी भी चाहिए | स्वाभाविक है | लेकिन सर आपको क्या लगता है पत्रकारों के लिए दलाल शब्द का उल्लेख पहली बार हुआ है..? या फिर आप इकलौते ऐसे पत्रकार हैं जिसे दलाल कहा गया है..? या फिर आपसे पहले किसी पत्रकार को दलाल नहीं कहा गया..? कहा गया है सर हमेशा से कहा गया है | बस तब कहने वालों की आवाज़ आप लोगों के कानों तक पहुंचती नहीं थी | क्योंकि उनके पास अपनी प्रतिक्रिया आप लोगों तक पहुंचाने का कोई माध्यम ही नहीं था | टीवी और रेडियो के अंदर बैठे आप जैसे बुद्धिजीवी, वक्ता हुआ करते थे | और अख़बारों में लिखने वाले बुद्धिजीवी, लेखक हुआ करते थे | जबकि टीवी और रेडियो के बाहर बैठे लोग दर्शक और श्रोता थे | और अखबार पढ़ने वाला पाठक | आप लोग जो दिखाते, बोलते और छापते थे | लोग बस उसे देख, सुन और पढ़ लिया करते थे | आपके विचारों पर अपनी प्रतिक्रिया को ना तो वो दिखा पाते थे, ना सुना पाते थे और ना ही आपको पढ़ा पाते थे | सूचना-संचार की अपनी-अपनी व्यवस्था के भीतर बैठे आप जैसे बुद्धिजीवी, उस व्यवस्था के बाहर बैठे लोगों को बुद्धिहीन समझा करते थे |

लेकिन अब व्यवस्था बदल चुकी है सर | अपनी प्रतिक्रिया बुद्धिजीवियों तक पहुंचाने के लिए बुद्धिहीनों को अब माध्यम मिल चुका है | इसलिए सोशल मीडिया पर अपने लिए कंफर्ट ज़ोन ढूंढ़ना बंद कर दीजिए सर | यहां आपके लिखे पर प्रतिक्रिया आएगी | मीठी भी और कड़वी भी | और जब आप टीवी की स्क्रीन और अख़बार के पहले पन्ने को काला कर देंगे तब आप से ऐसा करने की वजह भी पूछी जाएगी | क्योंकि कल तक जो श्रोता था आज वो वक्ता बन चुका है | शायद यही बात आप जैसे बुद्धिजीवियों को खटकने भी लगी है | और हां, “डू यू एवर थिंक सर,  कि पत्रकारों को दलाल क्यों कहा जाने लगा है” | क्योंकि हकीकत में आज का पत्रकार दलाल ही हो गया है | कुछ प्रत्यक्ष रूप से दलाली करके विधायक, सांसद, और मंत्री बन चुके हैं | और कुछ अप्रत्यक्ष रूप से दलाली करके विधायक, सांसद, और मंत्री बनने की जुगत में जुटे हैं | इन सबके बीच में आप कहां खड़े हैं इसका अवलोकन आप को करना है |

अब आपकी प्रॉस्टीट्यूट वाली बात पर आता हूं | मीडिया को इस नए नाम से इसलिए सुशोभित किया जाने लगा सर,  क्योंकि नकारात्मकता से ओत प्रोत कुछ पत्रकार अपनी सुविधा के मुताबिक ग़लत को तो ग़लत कह ही रहे हैं | साथ ही सही को भी गला फाड़-फाड़कर ग़लत कह रहे हैं | हो सकता है कि आप बीजेपी की विचारधारा से सहमत ना हों | हो सकता है कि मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार की कार्यशैली आपकी अपेक्षाओं के अनुरूप ना हो | लेकिन सरकार के दो साल के कार्यकाल में क्या एक भी ऐसा काम नहीं हुआ..? जिसने आपकी कलम और आपकी वाणी को सुकून दिया हो | 2009 से आपको लगातार देख रहा हूं | आपकी आलोचनात्मक शैली का कायल रहा हूं | दिल्ली के बवाना में गरीबी रेखा पर रवीश की रिपोर्ट के दौरान एक छोटे बच्चे के चारपाई से गिरकर नीचे से लुढ़क जाने पर आपका ये कहना कि "लीजिए पार कर गया ये बच्चा गरीबी रेखा को" | व्यवस्था पर आपके ऐसे तंज़ बहुत प्रभावित किया करते थे | लेकिन अब आपके वही तंज़ नकारात्मक लगने लगे हैं | क्यों इसका अवलोकन भी आपको ही करना है |

असल में सर प्रधानमंत्री के प्रति आपका व्यवहार गांव के उस प्रधान प्रत्याशी की तरह हो गया है जिसे मौजूदा ग्राम प्रधान द्वारा करवाया गया एक भी अच्छा काम अच्छा नहीं लगता है | यहां तक कि उसके दरवाज़े तक बिछाए गए खड़ंजे और उसकी बाउंड्री वॉल के अंदर लगाये गए सरकारी हैंडपंप में भी उसे खोट ही नज़र आती है | हम जैसे कम पढ़े लिखे लोग इसे अंधविरोध से ग्रसित बीमारी कहते हैं | आप जैसे बुद्धिजीवी क्या कहते हैं | ये आप जानें | और अब आखिरी बात, मीडिया की पढ़ाई में लाखों रूपये ख़र्च करने वाले युवाओं के लिए घड़ियाली आंसू बहाना बंद करिए सर | क्योंकि हर महीने लाखों रूपये का वेतन लेने वाले वरिष्ठ पत्रकारों को अगर वाकई में कनिष्ठ पत्रकारों के प्रति इतनी ही सहानुभूति है | तो प्रबंधन से कह दीजिए कि आपकी मोटी तनख़्वाह का कुछ हिस्सा उन युवा पत्रकारों को दे दिया जाए | जो 5 हज़ार, 10 हज़ार और 15 हज़ार में 12-12 घंटे अपनी ऐसी की तैसी करवा रहे हैं | युवा बेरोज़गार पत्रकारों को कोसने से बेहतर होगा उस नर्सरी को कोसिये जहां से ये बेरोज़गार पत्रकार तैयार किए जा रहे हैं |

कुकुरमुत्तों की तरह हर गली मुहल्ले में मीडिया संस्थान खुल रहे हैं | यहां तक की हर निजी न्यूज़ चैनल्स के अपने-अपने मीडिया इंस्टीट्यूट हैं | जिसमें NDTV भी शामिल है | अगर कुछ करना ही है तो ऐसे मीडिया संस्थानों को बंद करवाने की दिशा में कुछ काम करिए | प्राइम टाइम का एक एपिसोड इसी मुद्दे पर खर्च कर दीजिए | असहिष्णुता के मुद्दे पर जिस तरह जंतर मंतर की सड़कों पर आप मार्च निकाल रहे थे | उसी तरह एक मार्च इन मीडिया संस्थानों के खिलाफ भी निकालिए | 10  बेरोज़गार युवा पत्रकारों को लेकर मैं ख़ुद आउंगा | और 10 हज़ार अपने आप आ जाएंगे | लेकिन नहीं आप ऐसा नहीं कर सकेंगे | क्योंकि नैतिकता की बातें करना और वास्तविक जीवन में उसे अपनाना दोनों में बहुत बड़ा अंतर है सर | इसलिए युवा पत्रकारों के लिए ये ढोंग दिखाना बंद करिए | लिखना तो और भी बहुत कुछ है लेकिन पत्र बहुत बड़ा हो जाएगा | शायद आपके प्राइम टाइम के ओपनिंग एंकर से भी ज्यादा बड़ा | इसलिए अब बाकी की बातें अगले पत्र में | और हां सवाल उठाते हुए एक वाक्य को अंग्रेजी में इसलिए लिख दिया क्योंकि एमजे अकबर को लिखे अपने पत्र में आपने 2 जगहों पर अंग्रेज़ी में ही सवाल पूछे थे | वो देखकर मुझे लगा अंग्रेज़ी वाले सवाल ज्यादा प्रभावशाली होते हैं | इसलिए मैंने भी वही प्रभाव दिखाने की कोशिश की है | बाकी तो अंग्रेज़ी में हाथ बहुत तंग है अपना |
सोचा था ये पत्र आपके घर के पते पर पोस्ट करूंगा | लेकिन पता, पता ना होने के कारण ये संभव नहीं हो पाया | इसके अलावा NDTV के दफ्तर में प्रवेश पाने योग्य पत्रकार मैं अभी बन नहीं पाया हूं | इसलिए वहां आकर हैंड टू हैंड पत्र दे पाने में भी सक्षम नही हूं | लिहाज़ा फेसबुक पर ही पोस्ट कर रहा हूं | इस उम्मीद के साथ कि घूमते-घूमते आप तक पहुंच ही जाएगा | और हां जिस तरह टीवी की दुनिया में दूसरे एंकरों की तुलना में आप ख़ुद को ज़ीरो टीआरपी वाला एंकर बताते हैं | उसी तरह सोशल मीडिया पर आपकी तुलना में मैं भी ज़ीरो टीआरपी वाला पत्रकार हूं | लेकिन आप लोगों द्वारा बनाई गई व्यवस्था का हिस्सा हूं | इसलिए आपसे प्रतिउत्तर की अपेक्षा रहेगी | धन्यवाद |

वरिष्ठ पत्रकारों की मीडिया का एक कनिष्ठ पत्रकार

( अमित गर्ग शुक्ला )

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