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Friday, 9 December 2016

दाउद इब्राहीम और कांग्रेस के इशारे पर शाहरुख ख़ान की नई फिल्म ‘रईस’ के माध्यम से एक ऐसे क्रिमिनल , गुंडे को महिमामंडित किया जा रहा है जिसका शिकार सिर्फ हिन्दू हुआ करते थे

कैसे यहाँ की फिल्म इंडस्ट्री और कुछ राजनेता मिलकर इतिहास को अपने अनुसार बनातें और बदल्तें हैं , इसकी बानगी भर है शाहरुख खान की आने वाली फिल्म "रईस" . कैसे किसी शख्स की इमेज बनाई और बिगारी जाती है ये दाउद इब्राहीम , शाहरुख खान और कांग्रेस से आप सिख सकतें हैं .

शाहरुख ख़ान की नई फिल्म ‘रईस’
की रिलीज़ की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही है, इसे लेकर विवाद भी तेज़ होते जा रहे हैं। दरअसल यह फिल्म गुजरात के कुख्यात अपराधी और शराब तस्कर अब्दुल लतीफ की जिंदगी पर आधारित बताई जा रही है। 90 के दशक में पूरे गुजरात में अब्दुल लतीफ का आतंक हुआ करता था। उसके टारगेट पर ज्यादातर हिंदू ही हुआ करते थे, लिहाजा वो मुसलमानों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया था। सवाल है कि ऐसे अपराधी पर फिल्म बनाकर शाहरुख खान उसका महिमामंडन क्यों करना चाहते हैं? रईस के ट्रेलर को देखकर ऐसा लग रहा है कि इस सड़कछाप गुंडे को किसी एक्शन हीरो और व्यापारी की तरह दिखाया गया है।

जानिए कौन था अब्दुल लतीफ?

लतीफ बचपन से ही अपराध की दुनिया में उतर चुका था। पहले वो अहमदाबाद में जुए के अड्डों पर शराब पिलाने का काम किया करता था। इसके बाद उसने नकली शराब सप्लायर का धंधा स्टार्ट कर दिया। इस धंधे में रहते हुए उस पर मर्डर, अवैध वसूली जैसे तमाम केस दर्ज हो चुके थे। इसी दौरान उसने राज्य में सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी का आशीर्वाद हासिल कर लिया। सियासी शह मिलने के बाद उसने अपना कारोबार पूरे गुजरात में फैला लिया। अब वो हवाला, सुपारी लेकर हत्या करने और जमीन हड़पने जैसे धंधों में भी उतर गया। बताते हैं कि लतीफ गुजरात के पश्चिमी तट पाकिस्तान से हथियार और गोला-बारूद मंगाया करता था। 1995 में जब लतीफ के घर पर छापा मारा गया था तो करीब 100 एके 47 राइफलें और 50 हजार के करीब ग्रेनेड बरामद हुए थे। वो गुजरात में दाऊद इब्राहिम के सबसे भरोसेमंद आदमी के तौर पर जाना जाता था। उसे करीब से जानने वालों के मुताबिक लतीफ की सारी ताकत सियासी शह के कारण थी, वरना निजी जिंदगी में वो बेहद डरपोक किस्म का आदमी था।

‘मुसलमानों के मसीहा’ की इमेज

गुजरात के मुसलमानों के बीच लतीफ ने अपनी इमेज रॉबिनहुड की तरह बनाई थी। आज भी गुजरात में कहानियां चलती हैं कि लतीफ गरीब मुस्लिम नौजवानों को नौकरी दिलाया करता था। इसके अलावा गरीबों को खाना, घर और दूसरी मदद करता था। उस दौरान वो बाकायदा कोर्ट भी लगाता था और लोगों के आपसी झगड़े और विवाद सुलझाया करता था। इन सब कामों के कारण पूरे गुजरात के मुसलमानों के बीच उसे मसीहा के तौर पर देखा जाने लगा। कोई दिक्कत होने पर लोग पुलिस की बजाय लतीफ के पास जाना पसंद करते थे।

हिंदुओं के लिए आतंक का दूसरा नाम

अब्दुल लतीफ का क़हर खास तौर पर हिंदू समुदाय पर टूटा। उसका डर ऐसा था कि अहमदाबाद के कई इलाकों से हिंदू अपना घर-बार छोड़कर भाग गए थे। लतीफ ने ऐसे कई लोगों के घरों पर मुस्लिम परिवारों से अवैध कब्जे तक करवाए। कहा जाता है कि उसने हिंदू कारोबारियों को लूटा, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किए और करवाए। उसकी गैंग में सारे मुसलमान ही थे। लतीफ पर अपराध के 97 केस दर्ज थे, जिनमें 10 हत्या के और कुछ केस टाडा के तहत थे।

अब्दुल लतीफ और ‘सेकुलर सियासत’

1990 से 1995 के बीच चिमनभाई पटेल की अगुवाई वाली जनता दल और कांग्रेस की सरकारों में अब्दुल लतीफ को खूब सरकारी शह मिली। इस दौरान उसका काला कारोबार खूब फला-फूला। इस दौरान चुनावों में कांग्रेस को फायदा पहुंचाने के लिए लतीफ दंगे भी भड़काया करता था। लेकिन 1995 में गुजरात में केशुभाई पटेल की अगुवाई में बीजेपी की सरकार बन गई। इसी दौरान लतीफ पाकिस्तान भाग गया। बीजेपी की सरकार बनने के बाद लतीफ के कारोबार पर बंदिश लगनी शुरू हो गई। इसी दौरान यह बात सामने आई कि किस तरह से अब्दुल लतीफ का धंधा दाऊद और कांग्रेस की मदद से इतने साल तक चलता रहा। कहते हैं कि अब्दुल लतीफ की अगुवाई में मुस्लिम आतंक का ही नतीजा था कि गुजरात में हिंदू समुदाय बीजेपी के साथ आने लगा। क्योंकि लोगों को लगने लगा था कि कांग्रेस पार्टी अब्दुल लतीफ की कारगुजारियों को बढ़ावा दे रही है।

कैसे हुआ अब्दुल लतीफ का अंत?

कुछ महीने पाकिस्तान में रहने के बाद अब्दुल लतीफ भारत लौट आया। यहां वो वो दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में छिपकर रहने लगा। यहां से वो एक पीसीओ से रोज फोन करके अपने गुर्गों से बात किया करता था। लेकिन एक दिन पुलिस ने जाल बिछाकर उसे पकड़ लिया। जब लतीफ को पुलिस ने गिरफ्तार किया तो पूरे गुजरात में हिंदू आबादी वाले इलाकों में आतिशबाजी हुई थी। उसके बाद जगह-जगह मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के लिए सम्मान और धन्यवाद समारोह आयोजित किए गए थे। गिरफ्तारी के बाद लतीफ को साबरमती सेंट्रल जेल में रखा गया। 29 नवंबर 1997 को लतीफ ने जेल से भागने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने उसे मार गिराया। उस वक्त शंकर सिंह वाघेला गुजरात के सीएम बन चुके थे। कांग्रेस और लतीफ के हितैषी कहते हैं कि ये फेक एनकाउंटर था।

किसको धोखा दे रहे हैं शाहरुख़?

‘रईस’ के निर्माता कह रहे हैं कि इस फिल्म का लतीफ से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि शाहरुख कम से कम दो बार लतीफ के परिवार से मिले थे, ताकि वो उसकी स्टाइल और बातचीत करने के तरीकों के बारे में जान सकें। रईस में अपने किरदार की रिसर्च के दौरान शाहरुख ने अब्दुल लतीफ से जुड़ी बहुत सारी जानकारियां भी मंगाई थीं। लेकिन जैसे ही यह एहसास हुआ कि मामला हिंदू-मुस्लिम का रंग ले सकता है और इसका असर फिल्म पर भी पड़ सकता है, शाहरुख ने पलटी मार दी और उन्होंने लतीफ के परिवार के सदस्यों और उसके बेटे मुश्ताक से मिलना बंद कर दिया।
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लतीफ के बेटे से विवाद का ड्रामा!

बताते हैं कि शाहरुख ने लतीफ के बेटे मुश्ताक से खुद के खिलाफ 101 करोड़ रुपये का केस भी दर्ज करवाया। ताकि लोगों में यह इंप्रेशन जाए कि फिल्म रईस का लतीफ से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि मुश्ताक की शिकायत फिल्म के डायरेक्टर राहुल ढोलकिया से ज्यादा है। क्योंकि ‘रईस’ में उन्होंने लतीफ को कोठे चलाते और औरतों से शराब बिकवाते दिखाया है। मुश्ताक का दावा है कि उसने ये काम कभी नहीं किया। फिल्म में ऐसा दिखाने से उनके परिवार की ‘इज्ज़त’ पर बुरा असर पड़ेगा। हालांकि उस दौर के पुलिस अफसरों की मानें तो अब्दुल लतीफ कोठे चलाने और औरतों के इस्तेमाल ही नहीं, बल्कि इससे भी घटिया किस्म के अपराधों में शामिल था।

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