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Friday, 29 September 2017

रोहिंग्या शरणार्थियों के मसले पर बंट गईं विश्व की महाशक्तियां


संयुक्त राष्ट् - म्यांमार में रोहिंग्या शरणार्थियों के मसले पर अंतरराष्ट्रीय दबाव की वजह से संयुक्त राष्ट्र की बैठक तो हुई लेकिन महाशक्तियां बंटी नजर आईं। इस मसले पर संयुक्त राष्ट्र की पहली ओपन बैठक में चीन और रूस ने जहां म्यांमार सरकार का समर्थन किया वहीं अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ चल रही हिंसा रोकने की मांग की। म्यांमार के रोहिग्यां संकट ने विकराल रूप ले लिया है। म्यांमार में हिंसा और हत्या से बचने के लिए 25 अगस्त तक पलायन करने वाले रोहिंग्या मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों की संख्या 5 लाख को पार कर चुकी है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ऐंतोनियो गुतेरस ने म्यांमार में जारी हिंसा के माहौल को खत्म करने के लिए सुरक्षा परिषद से सख्त कदम उठाने की अपील की है। सुरक्षा परिषद की ओपन बैठक में अमेरिकी राजदूत निकी हेली ने म्यांमार की हालत पर चिंता जताई है।











 उन्होंने म्यांमार को बर्मा पुकारते हुए काउंसिल सदस्यों से कहा कि हमें इस बात को कहने से नहीं हिचकना चाहिए कि बर्मा अल्पसंख्यक समुदाय के खात्मे के लिए क्रूर कैंपेन चला रहा है। उन्होंने अपने नागरिकों के खिलाफ हिंसारत होने का आरोप लगाते हुए म्यांमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। हेली ने सभी देशों से आग्रह किया कि वे म्यांमार की सेना को हथियारों की सप्लाई करना बंद कर दें। अमेरिका,ब्रिटेन और फ्रांस के साथ परिषद के काफी सदस्यों ने हिंसा पर रोक लगाने के लिए सुरक्षा परिषद की कड़ी कार्रवाई का समर्थन किया। 88 सिविल सोसायटी और मानवाधिकार संगठनों के वैश्विक गठबंधन ने सुरक्षा परिषद से म्यांमार पर दबाव बनाने की अपील की है। 


पर चीन और रूस ने लिया म्यांमार का पक्ष 


सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों में तीन जहां म्यांमार के खिलाफ खड़े हुए वहीं चीन और रूस ने अलग रुख अपनाया। दोनों ही महाशक्तियों ने रोहिंग्या संकट से जूझने के लिए म्यांमार के कदमों का समर्थन किया।










 म्यांमार के साथ करीबी संबंध वाले चीन के डेप्युटी यूएन ऐंबैसडर ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को म्यांमार सरकार की चुनौतियों और कठिनाइयों को भी समझना चाहिए। चीनी दूत ने कहा कि म्यांमार को मदद की जरूरत है। उन्हें रखाइन प्रांत में जारी हिंसा को लंबे समय से चली आ रही समस्या बताते हुए कहा कि इसका कोई त्वरित निदान नहीं है। संयुक्त राष्ट्र में रूस के राजदूत ने भी चेताते हुए कहा कि म्यांमार की सरकार पर 'अत्यधिक दबाव' केवल उस देश और आसपास की स्थिति को बिगाड़ेगा ही।

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