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Saturday, 4 November 2017

विकास , हिन्दुत्व पर भारी जातिवाद का मुद्दा ............


गुजरात की सड़कों पर घूमते हुए आप बड़े-बड़े होर्डिंग्स देख सकते हैं जिन पर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के फोटो के साथ लिखा हुआ है 'मैं विकास हूं, मैं गुजरात हूं।' नारे से साफ है कि इस चुनाव में भाजपा का मुख्य एजेंडा विकास है। लेकिन जमीन पर अब जातिवाद का मुद्दा पनपने लगा है। 1985 के बाद पहली बार कांग्रेस विकास और हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर जातिवाद के जरिए हावी होने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक दलों की तो छोड़िए गुजरात का आम आदमी अपना राजनीतिक नजरिया जातिवाद का चश्मा पहन कर जाहिर कर रहा है।






1985 में माधवसिंह सोलंकी ने 'खाम' के जरिये कांग्रेस को जो जीत दिलायी थी वो किसी भी पार्टी के लिए गुजरात में अब तक की सबसे बड़ी जीत थी। खाम यानी 'के' से क्षत्रिय, 'एच' से दलित, 'ए' से आदिवासी और 'एम' से मुस्लिम। इस समीकरण ने कांग्रेस को राज्य की 182 में से 149 सीटों पर जीत दिलवायी थी। परंतु 1990 की हिंदुत्व की आंधी में खाम तहस नहस हो गया। तब से लेकर पिछले चुनाव तक कांग्रेस के सितारे गर्दिश में रहे। इस बार वह फिर 1985 की लकीर पर लौटने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी हर सभा में गुजरात की जातियों का मुद्दा उठा रहे हैं। वलसाड जिले के पारदी शहर में हुई सभा में शुक्रवार को उन्होंने कहा 'गुजरात का सच पाटीदार युवाओं पर चलायी गोलियां हैं, गुजरात का सच उना में दलितों पर बरसायी लाठियां हैं, गुजरात का सच आदिवासियों की भूख उनकी गरीबी है।'
कहते हैं प्यार और युद्ध में सब जायज है, संभवत: इसलिए चुनावी युद्ध जीतने के लिए कांग्रेस इस बार जातिवाद का सहारा ले रही है। अचरज इस बात का है कि गुजरात के लोग खासकर युवाओं में इस बार जातीय स्वाभिमान उछालें भर रहा है। कोई पटेलों के हक की बात करता मिल रहा है तो किसी की बातों में राजपुताना ठसक झलकती है। महात्मा गांधी की जन्मभूमि पोरबंदर में मिले दिलीप सिंह झाला फिल्मकार संजय लीला भंसाली पर बरसते दिखे। वे कहते हैं 'देश में राजपूतों के खिलाफ एक षडयंत्र चल रहा है। जानबूझकर समाज के गौरवशाली अतीत की धज्जियां उड़ायी जा रही है।' उनका गुस्सा रानी पद्मावती फिल्म को लेकर था। झाला का कहना था कि सरकार ने यदि इस फिल्म को बैन नहीं किया तो राजपूत भूलकर भी भाजपा को वोट नहीं देगा।

भंसाली जब इस फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे होंगे तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी फिल्म रिलीज होने से पहले एक राज्य का चुनावी मुद्दा बन सकती है। इसका श्रेय पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला को जाता है। वाघेला ने राजपूत वोटर्स को अपनी पार्टी के पक्ष में लामबंद करने की गरज से इस मुद्दे को उठाया। मजबूर हो कर भाजपा को भी अपने राजपूत प्रवक्ता आईके जडेजा को आगे कर चुनाव आयोग से यह मांग करवानी पड़ी कि चुनाव तक इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाई जाए।

फिल्म के विरोध को लेकर चर्चा में आयी करणी सेना रविवार को गांधीनगर में प्रदर्शन भी करने वाली है। गुजरात में राजपूतों का वोट शेयर 5 फीसदी है, लेकिन राजनीतिक ताकत वाघेला के कमजोर होने के बाद से खत्म सी हो गयी है। सोमनाथ के विजयसिंह चंपावत को उम्मीद है कि कांग्रेस यदि सत्ता में आती है तो शक्तिसिंह गोहिल मुख्यमंत्री बनेंगे।




राज्य का पाटीदार समुदाय जरूर इस बार आरपार की मुद्रा में है। राजकोट द्वारका हाईवे के गांव जोगवाड के किशन पटेल का कहना था कि पटेलों ने भाजपा को इतना कुछ दिया, लेकिन भाजपा ने हमको सिर्फ धोखा दिया। वो कहते है 'आरक्षण तो बहुत बडा मुद्दा है, लेकिन जिस तरह से आनंदीबेन पटेल को हटाया और नितिन भाई पटेल को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया गया इससे पटेलों में नाराजगी है।' द्वारकाधीश मंदिर समिति से जुड़े हेमंत पटेल का कहना था कि पाटीदार समाज शुरू से भाजपा के साथ रहा है और आगे भी रहेगा। उनका सवाल है कि 'राहुल गांधी बताएं कि कांग्रेस पार्टी ने आज तक पाटीदारों के लिए क्या किया?'
हेमंत कहते हैं 'हार्दिक की हवा सिर्फ कुछ युवाओं तक सीमित है। समाज के लोग अस्सी के दशक में कांग्रेस द्वारा किये गये अत्याचार को अब तक नहीं भूल पाए। कांग्रेस पाटीदारों का उपयोग सिर्फ चुनावों के लिए कर रही है ऐसा मानने वालों की तादाद भी कम नहीं है। द्वारका में ही मिले कालूभाई पटेल का कहना था कि हम शुरू से भाजपा को वोट देते आए हैं। हमारे यहां पिछली छह बार से जो भाजपा विधायक चुनाव जीत रहा है वह पटेल नहीं है। तब भी पटेल वोट उसी को मिलते रहे हैं।

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