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Sunday, 24 December 2017

एक नजर अटल बिहार बाजपेयी के जीवन और उनके कुछ प्रेरक प्रसंग पर : ABT Network





सर्ब प्रथम अटल बिहारी बाजपेयी के जीवन को जानते हैं :

दोस्तों, पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी भारत माता के एक ऐसे सपूत हैं , जिन्होंने स्वतंत्रता से पूर्व और पश्चात भी अपना जीवन देश और देशवासियों के उत्थान एवं कल्याण हेतु जीया तथा जिनकी वाणी से असाधारण शब्दों को सुनकर आम जन उल्लासित होते रहे और जिनके कार्यों से देश का मस्तक ऊंचा हुआ. मघ्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ब्राह्मण परिवार में 25 दिसंबर, 1924 को इनका जन्म हुआ. पुत्रप्राप्ति से हर्षित पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी को तब शायद ही अनुमान रहा होगा कि आगे चलकर उनका यह नन्हा बालक सारे देश और सारी दुनिया में नाम रौशन करेगा.

इन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज - जो अब लक्ष्मीबाई कॉलेज कहलाता है - में तथा कानपुर उ. प्र. के डी. ए. वी. कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की और राजनीति विज्ञान में एम. ए.की उपाधि प्राप्त की. सन् 1993 मे कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा दर्शन शास्त्र में पी.एच डी की मानद उपाधि से सम्मानित किए गए.

भारतीय स्वातंत्र्य-आंदोलन में सक्रिय योगदान कर 1942 में जेल गए. वाजपेयी जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय सदस्य और सन् 1951 में गठित राजनैतिक दल ‘भारतीय जनसंघ’ के संस्थापक सदस्य थे. सन् 1966-67 सरकारी प्रत्याभूतियों की समिति के अघ्यक्ष, सन् 1967 से 70 तक लोक लेखा समिति के अघ्यक्ष रहे. सन् 1968 से 73 तक वे भारतीय जनसंघ के अघ्यक्ष थे. सन् 1975-77 के दौरान आपातकाल में बंदी रहे. 1977 से 79 तक भारत के विदेश  मंत्री, सन् 1977 से 80 तक जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य, सन् 1980-86 भाजपा अघ्यक्ष, सन् 1980-84 , 1986 तथा 1993-96 के दौरान भाजपा संसदीय दल के नेता रहे. सन् 1957 में दूसरी लोकसभा के लिए प्रथम बार निर्वाचित हुए. तब से 2004 में 14वीं लोकसभा हेतु हुए संसदीय आम चुनाव तक ये  उत्तर प्रदेश  में लखनऊ से प्रत्याशी  होकर निर्वाचित होते रहे. सन् 1962-67 और 1986-91 के दौरान आप राज्य सभा के सम्मानित सदस्य थे और सन् 1988 से 89 तक सार्वजनिक प्रयोजन समिति के सदस्य. ये  सन् 1988-90 में संसद् की सदन समिति तथा व्यापारिक परामर्श समिति के सदस्य रहे. सन् 1990-91 में याचिका समिति के अघ्यक्ष बने और सन् 1993 से 1996 तक तथा 1997 -98 में विदेश नीति समिति के अघ्यक्ष रहे. सन् 1993-96 और 1996-97 में  लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे.

सन् 1999 में लोक सभा में भाजपा संसदीय दल के नेता और सन् 2004 में भाजपा और एनडीए संसदीय दल के अघ्यक्ष रहे.

भारत के बहुदलीय लोकतंत्र में ये  ऐसे एकमात्र राजनेता हैं, जो प्रायः सभी दलों को स्वीकार्य रहे. इनकी  विशेषता  के कारण ये  16 मई, 1996 से 31 मई, 1996 तथा 1998 - 99 और 13 अक्तूबर, 1990 से मई, 2004 तक तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे. भारत की संस्कृति, सभ्यता, राजधर्म, राजनीति और विदेश नीति की इनको  गहरी समझ है. बदलते राजनैतिक पटल पर गठबंधन सरकार को सफलतापूर्वक बनाने, चलाने और देश को विश्व में एक शक्तिशाली गणतंत्र के रूप में प्रस्तुत कर सकने की करामात इन जैसे करिश्माई नेता के बूते की ही बात थी. प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में जहां इन्होंने पाकिस्तान और चीन से संबंध सुधारने हेतु अभूतपूर्व कदम उठाए वहीं अंतर राष्ट्रीय दवाबों के बावजूद गहरी कूटनीति तथा दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए  पोकरण में परमाणु विस्फोट किए तथा कारगिल-युद्ध जीता.

राजनीति में दिग्गज राजनेता, विदेश नीति में संसार भर में समादृत कूटनीतिज्ञ, लोकप्रिय जननायक और कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ ये  एक अत्यंत सक्षम और संवेदनशील कवि, लेखक और पत्रकार भी रहे हैं. विभिन्न संसदीय प्रतिनिधिमंडलों के सदस्य और विदेश मंत्री तथा प्रधानमंत्री के रूप में इन्होंने  विश्व के अनेक देशों की यात्राएं की हैं और भारतीय कुटनीति तथा विश्वबंधुत्व का घ्वज लहराया है. राष्ट्र धर्म (मासिक), पाञ्चजन्य (साप्ताहिक), स्वदेश (दैनिक), और वीर अर्जुन (दैनिक), पत्र-पत्रिकाओं के आप संपादक रह चुके हैं. विभिन्न विषयों पर इनके द्वारा  रचित अनेक पुस्तकें और कविता संग्रह प्रकाशित हैं.आजीवन अविवाहित, अद्भुत व्यक्तित्व के घनी श्री वाजपेयी पढ़ने -लिखने, सिनेमा देखने, यात्राएं करने और खाना पकाने-खाने के शौकीन हैं. देश की आर्थिक उन्नति, वंचितों के उत्थान और महिलाओं तथा बच्चों के कल्याण की चिंता उन्हें हरदम रहती है. राष्ट्र सेवा हेतु राष्ट्रपति द्वारा पद्म विभूषण से अलंकृत श्री वाजपेयी 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार और सर्वोत्तम सांसद के भारतरत्न पंडित गोविन्द बल्लभ पंत पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कारों, सम्मानों से विभूषित तथा सम्मानित हैं. कई प्रतिष्टित संस्थाओं-संगठनों और समितियों के आप सम्मानित सदस्य हैं.

कई दशकों तक भारतीय राजनैतिक पटल पर छाये रहने के बाद अपने स्वास्थ्यजनित शारीरिक अक्षमता के कारण वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में आप ओझल हो गए से प्रतीत होते हैं, किन्तु मानसिक रूप से आप अभी भी पूर्णरूपेण सजग, सबल और सक्रिय हैं तथा पार्टी और संगठन को दिशा दे रहे हैं. भारत को सफल नेतृत्व देने वाले प्रधानमंत्रियों में अग्रगण्य माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के स्वास्थ्य और दीर्धायु की हम कामना करते हैं .

अटल बिहारी बाजपेयी के कुछ प्रेरक प्रसंग :  

8 मई, 1953 को दिल्ली स्टेशन पर धोती-कुर्ता पहने एक युवा कंबल में लिपटे अपने सामान को रेल के अनारक्षित डिब्बे में धकेल रहा था। वह डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के समर्थन में जा रहा था, जिन्होंने कश्मीर में प्रवेश के लिए अनुमति लेने के खिलाफ तथा जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के समर्थन में अभियान छेड़ रखा था। यह युवक था डॉ. मुखर्जी का राजनीतिक सचिव अटल बिहारी वाजपेयी। 10 मई, 1953 को बिना अनुमति के जम्मू-कश्मीर सीमा में प्रवेश करते समय डॉ. मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें श्रीनगर जेल भेज दिया गया। उन्होंने वाजपेयी को दिल्ली वापस भेजा, ताकि वे पार्टी कार्यकर्ताओं को एकजुट कर सकें। उन्होंने संदेश दिया - 'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।"





श्रीनगर जेल में संदिग्ध हालात में डॉ. मुखर्जी की 23 जून, 1953 को मौत हो गई। अब युवा वाजपेयी अपने नेता का संदेश जन-जन तक पहुंचाने में जुट गए। दूसरे आम चुनाव में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से अटल बिहारी वाजपेयी लोकसभा के लिए चुन लिए गए। लोकसभा में उनके ओजस्वी और धाराप्रवाह भाषण से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू समेत तमाम राजनेता उनके मुरीद हो गए। एक विदेशी प्रतिनिधिमंडल से वाजपेयी को मिलवाते हुए नेहरू ने कहा था कि यह नौजवान एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा।

8 अप्रैल 1964 को जब नेशनल कांफ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला को सरकार ने नजरबंदी से मुक्त कर दिया और उन्हें पाक के कब्जे वाले कश्मीर में जाने की अनुमति दे दी तो अटल बिहारी वाजपेयी ने नेहरू का कड़ा विरोध किया, किंतु 27 मई को नेहरू के निधन पर उन्होंने राजनीतिक विरोध को किनारे करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि भी दी। वाजपेयी के व्यक्तित्व की यह अनोखी खूबी है।

अटल बिहारी वाजपेयी 47 साल तक संसद के सदस्य रहे। 10 बार लोकसभा में निर्वाचित हुए और दो बार राज्यसभा में। वे उत्तर प्रदेश के लखनऊ से छह बार लगातार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। किंतु करीब पांच दशक के इस सक्रिय राजनीतिक जीवन में कभी भी उनके दिमाग से कश्मीर का मुद्दा नहीं निकला। वे जवाहरलाल नेहरू की कश्मीर नीति के कटु आलोचक थे। अपने दिल के उद्गारों को कविताओं में अभिव्यक्त करते थे। अपने भाषणों में अकसर इन कविताओं का इस्तेमाल करते थे। उन्हें यह प्रतिभा अपने पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी से विरासत में मिली थी। वे बचपन से ही कविता लिखने लगे थे और अपने पिता के साथ कवि सम्मेलनों में जाया करते थे। 'मेरी इक्यावन कविताएं" शीर्षक से उनका कविता संग्रह बड़ा लोकप्रिय हुआ। 'अंतर्नाद" शीर्षक से उनकी कविताओं का एक एलबम भी तैयार हुआ था।

1977 में जनता पार्टी की सरकार में वाजपेयी विदेश मंत्री बने तो पड़ोसी देशों से दोस्ताना संबंध कायम किए। उनकी प्रसिद्ध उक्ति है - 'आप अपने दोस्त तो बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं।" यह उक्ति भारत की विदेश नीति का सूत्र-वाक्य बन गई। वाजपेयी का मानना है कि पाकिस्तान के साथ जम्मू-कश्मीर समेत तमाम मुद्दों का हल आपसी बातचीत से निकाला जा सकता है। इसमें किसी तीसरे पक्ष की आवश्यकता नहीं है। पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण ऑपरेशन शक्ति अटलजी का सामरिक मास्टर स्ट्रोक था। उन्होंने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल महाविनाश के बजाय आत्मरक्षा के लिए करने की बात कही। इसी के साथ उन्होंने भारत को विश्व के परमाणु विशिष्ट क्लब में शामिल करा दिया। लाहौर के गवर्नर हाउस में अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण को सुनने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के मुंह से निकला था - 'वाजपेयी साहब, अब तो आप पाकिस्तान में भी चुनाव जीत सकते हैं।"

जम्मू-कश्मीर में इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी के शांति, प्रगति और समृद्धि के पैगाम का कश्मीर के सभी वर्गों ने स्वागत किया। कारगिल युद्ध, कंधार कांड, भारत की संसद पर हमले जैसी बाधाओं के बावजूद वाजपेयी ने शांति प्रक्रिया को पटरी से नहीं उतरने दिया। उपमहाद्वीप में शांति की स्थापना के मद्देनजर उनकी सरकार ने विश्वास बहाली के उपाय जारी रखे। और अब नरेंद्र मोदी ने दक्षिण एशिया को आतंकवाद से मुक्त करने के वाजपेयी के सपने को पूरा करने का बीड़ा उठाया है। वाजपेयी के जन्मदिवस को सुशासन दिवस के रूप में मनाना उनका असल सम्मान है। यह उनके विराट व्यक्तित्व का ही प्रभाव है कि उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा का सभी दलों ने स्वागत किया ।

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