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Thursday, 28 December 2017

विपक्ष ने कहा- 'इस्लाम खतरे में है', तिलमिलाए एमजे अकबर ने दिया करारा जवाब ........






नई दिल्ली:
तीन तलाक विधेयक पर लोकसभा में बहस के दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से दिए गए बयान का हवाला देकर विपक्षी दलों ने 'इस्लाम खतरे में है' शब्द का प्रयोग किया तो केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर भड़क गए. एमजे अकबर ने तीन तलाक पर सदन में अपनी बात रखने के दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया. उन्होंने कहा, 'ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की क्या विश्वसनीयता है? इन्हें किसने मुस्लिम समाज का प्रतिनिधि बनाया है?' केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर यहीं नहीं रुके, कहा- 'इस्लाम खतरे में है, स्लोगन का प्रयोग भारत की आजादी के पहले समाज को बांटने के लिए प्रयोग किया जाता था. इस स्लोगन से समाज में जहर फैल रहा है.'

बीजेपी ने तलाक-ए-बिद्दत को बताया कुप्रथा :
लोकसभा में गुरुवार को पेश तीन तलाक संबंधी मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक को सरकार एवं बीजेपी ने मुस्लिम महिलाओं को न्याय और लैंगिक समानता दिलाने वाला ऐतिहासिक कदम करार दिया. जबकि कांग्रेस ने इसमें खामियां बताते हुए इसका दुरुपयोग होने की आशंका जतायी और सवाल किया कि महिलाओं के गुजारे भत्ते का क्या होगा और महिला आरक्षण विधेयक कब पेश किया जायेगा.
बीजेपी ने तलाक-ए-बिद्दत को कुप्रथा बताते हुए कहा कि इस्लामिक कानून कहां संहिताबद्ध है, इसे कोडिफाइड किया जाना चाहिए.

'कुप्रथा को कुरान में पाप कहा गया है' :


मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2017 पर सदन में चर्चा के लिये आगे बढ़ाते हुए विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने गत 22 अगस्त को तलाक-ए-बिद्दत को पूरी तरह असंवैधानिक बताते हुए संसद से इस संबंध में कानून बनाने पर विचार करने की बात कही थी. उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश ने कहा कि अगर इस कुप्रथा को कुरान में पाप कहा गया है तो इस आधार पर यह अवैध है. प्रसाद ने कहा कि हम किसी शरीया में हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं. यह पूरा विधेयक तलाक-ए-बिद्दत पर आधारित है. यह विधेयक किसी धर्म, मजहब या पूजा से नहीं जुड़ा बल्कि लैंगिक समानता के लिए है.

कांग्रेस की सुष्मिता देव ने की चर्चा की शुरुआत


चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस की सुष्मिता देव ने इस कानून के लागू होने के बाद इसका दुरुपयोग मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ होने की आशंका जताई. उन्होंने कहा कि अगर इस कानून में तीन साल की सजा के प्रावधान को देखें तो यदि दोषी पति जेल में है तो पीड़ित महिला को गुजारा भत्ता कौन देगा, इस पर सरकार ने विचार नहीं किया. सुष्मिता ने पूछा कि क्या इस काम के लिए सरकार कोई निधि बनाएगी.

उन्होंने कहा कि सरकार इस विधेयक से महिला सशक्तीकरण की बात कर रही है, जिसका समर्थन कांग्रेस भी करती है. लेकिन क्या सरकार बताएगी कि वह महिला आरक्षण विधेयक को सदन में कब लाएगी.





तुष्टीकरण की नीति के चलते महिलाओं का शोषण: मीनाक्षी लेखी


बीजेपी की मीनाक्षी लेखी ने कहा कि कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति के कारण मुस्लिम महिलाओं को परेशान होना पड़ा. आज मुस्लिम महिलाएं यह देखकर फैसला लेंगी कि उनके अधिकारों के लिये कौन खड़ा है और कौन उनके खिलाफ खड़ा है. मैं मुस्लिम बहनों को बताना चाहती हूं कि जब आपके नरेन्द्र मोदी जैसे भाई हो, तब डरने की कोई जरूरत नहीं है. हम उनके अधिकारों के लिये खड़े हैं.

उन्होंने कहा कि इस विधेयक में तीन तलाक के संबंध में दंडात्मक प्रावधान किये गए हैं. ‘इसी तरह से उन मुल्ला, मौलवियों के खिलाफ भी कानून में प्रावधान होना चाहिए जो तीन तलाक में शामिल होते हैं और हस्तक्षेप करते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि शरीया को आज तक संहिताबद्ध नहीं किया गया और मुस्लिम समुदाय के सांसदों को आगे आकर इस्लामी लॉ को संहिताबद्ध करने के लिए काम करना चाहिए.

इस साल तीन तलाक के तीन सौ मामले दर्ज


बहरहाल, रविशंकर प्रसाद ने कहा कि न्यायपालिका समय समय पर अपने फैसलों में एक बार में तीन तलाक कहकर पत्नी से रिश्ता खत्म करने की मुस्लिम समुदाय की प्रथा पर चिंता जताती रही है. उन्होंने कहा कि हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उम्मीद थी कि स्थिति सुधरेगी. लेकिन उसके बाद भी देश में सौ से अधिक मामले तीन तलाक के सामने आये हैं. इस साल तीन तलाक के तीन सौ मामले दर्ज किये गये हैं.

रविशंकर प्रसाद बोले-मुस्लिम देशों में तीन तलाक पर हैं कानून


मंत्री ने कहा कि जब बांग्लादेश, मिस्र, मोरक्का, ट्यूनीशिया, इंडोनेशिया, ईरान, श्रीलंका, मलेशिया और यहां तक कि पाकिस्तान जैसे देश ‘तीन तलाक’ की प्रथा को लेकर नियम लाते रहे हैं तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय होने पर हम खामोश कैसे रहेंगे. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने भी तीन तलाक को लेकर कानून बनाये हैं. प्रसाद ने सदन से अपील की कि इस विधेयक को सियासत की आंखों से नहीं देखा जाए, दलों की दीवारों में नहीं बांधा जाए, मजहब के तराजू पर नहीं तोला जाए और वोट बैंक के खाते से नहीं परखा जाए. उन्होंने सभी सदस्यों से सियासी झगड़े छोड़कर विधेयक को पारित कराने का आग्रह किया.

विधेयक को संसदीय स्थाई समिति को भेजने की की मांग की


कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि हम सब विधेयक के पक्ष में हैं लेकिन इसमें कुछ खामियां और अनिश्चितताएं हैं और सरकार ने भी एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि इस विधेयक के मसौदे को तैयार करने से पहले उसने किसी संगठन और अन्य पक्षों से मशविरा नहीं किया है. ऐसे में कमियों को दूर करने के लिए विधेयक को संसदीय स्थाई समिति को भेजना चाहिए.

कांग्रेस सांसद बोलीं, विधेयक लाने में 42 महीने क्यों लग गए


उन्होंने कहा, ‘‘हम सभी महिला सशक्तीकरण चाहते हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन एक महीने, 20 दिन या फिर 15 दिन की अवधि तय कर लें और स्थाई समिति में विस्तृत विचार-विमर्श के बाद विधेयक को लाया जाए.’’ कानून मंत्री प्रसाद ने विधेयक को स्थाई समिति में भेजने की मांग को वस्तुत: खारिज करते हुए कहा कि यह सिर्फ चार खंडों का विधेयक है. अगर किसी सदस्य को कोई कोई सुझाव देना है तो चर्चा के दौरान दे सकते हैं. उस पर विचार किया जाएगा और उचित लगा तो विधेयक में शामिल भी किया जाएगा.

चर्चा में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव ने यह भी कहा कि सरकार बताए कि अगर उसे मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय की इतनी चिंता है तो इस विधेयक को लाने में 42 महीने क्यों लग गये और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही क्यों इसे लाया गया.

तलाक-ए-बिद्दत की समाप्ति जरूरी: बीजेपी सांसद


चर्चा में भाग लेते हुए बीजेपी की मीनाक्षी लेखी ने कहा कि तीन तलाक से तीन तरह के अत्याचार होते हैं. जिसमें राजनीतिक अत्याचार है यानी वोट बैंक के लिए इस मुद्दे पर बात नहीं होती. आर्थिक अत्याचार होता है यानी पीड़ित महिलाओं को सड़क पर रहने को मजबूर कर दिया जाता है और इसके साथ ही मुस्लिम महिलाओं पर सामाजिक अत्याचार भी होता है.

उन्होंने कहा कि दरअसल इस देश में अल्पसंख्यक और कोई नहीं, महिलाएं ही हैं , चाहे किसी धर्म की बात कर लें. देश में सारे कानून धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन महिलाओं से संबंधित विषयों पर पर्सनल कानून बनाये गये. लेखी ने कहा कि अगर देश के कानूनी इतिहास को देखें तो 1937 से पहले देश में मुस्लिम समुदाय परंपरागत कानूनों का पालन करता था. इसी तरह की एक गलत प्रथा तलाक-ए-बिद्दत थी जिसे समाप्त करना जरूरी है.

तीन तलाक पर विधेयक की मुख्य बातें


1. तीन तलाक पर लाए गए विधेयक में कहा गया है कि यह विधान विवाहित मुस्लिम महिलाओं को लैंगिक न्याय और लैंगिक समानता के वृहतर सांविधिक ध्येयों को सुनिश्चित करेगा और उनके भेदभाव के प्रति सशक्तिकरण के मूलभूत अधिकारों के हित साधन में सहायक होगा.

2. इसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति की ओर से उसकी पत्नी के लिये, शब्दों द्वारा, चाहे बोले गए हों या लिखित हों या इलेक्ट्रानिक रूप में हो या किसी अन्य रीति में हो. चाहे कोई भी हो, तलाक की उद्घोषणा अवैध एवं अमान्य होगी.

3. इसमें कहा गया है कि जो कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को इस प्रकार से तलाक की उद्घोषणा करता है, उसे तीन वर्ष तक कारावास और जुर्माने से दंडित किया जायेगा.

4. विधेयक के कारणों एवं उद्देश्यों में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने शायरा बानो बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले तथा अन्य संबद्ध मामलों में 22 अगस्त 2017 को 3:2 के बहुमत से तलाक ए बिद्दत की प्रथा को निरस्त कर दिया था. यह निर्णय कुछ मुस्लिम पुरुषों की ओर से विवाह विच्छेद की पीढ़ियों से चली आ रही स्वेच्छाचारी और बेतुकी पद्धति से मुस्लिम महिलाओं को स्वतंत्र करने में बढ़ावा देता है.

5. इसमें कहा गया है कि तलाक ए बिद्दत को निरस्त करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और एआईएमपीएलबी के आश्वासनों के बावजूद देश के विभिन्न भागों से तलाक ए बिद्दत के माध्यम से विवाह तोड़ने की रिपोर्ट प्राप्त हुई हैं. इसलिये यह अनुभव किया गया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को प्रभावी करने के लिये और अवैध विवाह विच्छेद की पीड़ित महिलाओ की शिकायतों को दूर करने के लिये कार्रवाई आवश्यक है.


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