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Thursday, 8 November 2018

British गुलामी से चिढ़ने वाले 'तथाकथित Liberals' को "इस्लामिक गुलामी" से इतना प्रेम क्यों है ?


आप कभी दिल्ली के India Gate पे गए हैं ?

दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के सामने एक सड़क है जिसे राजपथ कहा जाता है । ये वही सड़क है जिसपे 26 जनवरी गणतंत्र दिवस पे परेड होती है , इसी सड़क राजपथ पे ब्रिटिश सरकार ने 1921 में एक War Memorial बनाने का निर्णय किया , उन सैनिकों की याद में जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में अपने प्राण गंवाए थे । 1921 में ये स्मारक बनना शुरू हुआ और 1931 में तत्कालीन वाइसराय Lord Irwin ने इसका उद्घाटन किया । इसपे उन 13,300 ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों के नाम खुदे हैं जो प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद हुए थे ।

1936 में इंग्लैंड के राजा साहेब जनाब जॉर्ज पंचम इंतकाल फरमा गए । तो तत्कालीन गुलाम ब्रिटिश इंडिया ने अपने राजा की याद में उनकी एक 70 फ़ीट ऊंची मूर्ति इसी India Gate पे स्थापित कर दी .........
एक गुलाम देश ने अपने बिदेसी राजा की मूर्ति लगा दी .........

फिर 1947 में हम आज़ाद हुए , आज़ाद हुए तो Viceroy House का नाम बदल के राष्ट्रपति भवन कर दिया ।
House of Parliament का नाम बदल के संसद भवन कर दिया गया ।

उस भवन में जो Chamber of Princes था उसका नाम बदल के Library Hall के दिया गया , State Council का नाम बदल के राज्यसभा हो गया और Central Legislative Assembly लोकसभा बन गयी , ये सब बदलाव आज़ादी के बाद हुए , ज़ाहिर सी बात है इसके पीछे जो मंशा रही होगी वो गुलामी के इतिहास से पिंड छुड़ाने की रही होगी ।

इतना सब कुछ बदल गया पर वो King George पंचम की 70 फ़ीट ऊंची मूर्ति वहीं लगी रही , 1947 से  1965 के काल में तत्कालीन समाजवादी मने सोसलिस्ट पार्टी के नेताओं ने बार बार देश में ये आवाज़ उठायी कि ये गुलामी का प्रतीक आज भी क्यों कायम है इस देश में ........ इसको हटाओ ........ कांग्रेसी नेहरू की सरकार थी ....... उन्ने एक न सुनी ........ तो फिर एक दिन समाजवादी नेता George Fernandis साहब के कुछ समाजवादी शिष्यों ने 13 अगस्त 1965 को King George की उस झक्क सफेद संगेमरमर मूर्ति के चेहरे पे डामर पोत दिया और उसके नाक कान तोड़ दिये .........

और उस मूर्ति के बगल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक फोटो रख दी , सरकार ने किसी तरह वो डामर पुता काला चेहरा साफ कराया , लाल बहादुर शास्त्री जी की सरकार थी । निर्णय हुआ कि गुलामी के चिन्ह इस मूर्ति को वाकई हटाया जाए ।

अब समस्या कि इसका करें क्या ? भारत सरकार ने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से बात की , भैया ले जाओ अपना राजा ........ उन्ने टका सा जवाब दे दिया ....... हमाए पास इतना फालतू टेम ना है , न हमाए इदर जगह है और न हमाए पास इत्ते पैसे , तुमाई मुसीबत तुम्ही सम्हालो , सरकार ने दिल्ली स्थित ब्रिटिश हाई कमीशन मने दूतावास से संपर्क किया , उन्ने भी कह दी , सोरी , हमाए पास फालतू जगह नही है ।

एक प्रस्ताव आया कि दिल्ली के किसी पार्क में लगवा देते हैं । उन दिनों दिल्ली में भारतीय जनसंघ यानी भाजपा के पिता जी का शासन था ........ उन्ने कही खबरदार ........ दिल्ली MCD में तो हरगिज नही ।

अंततः 1968 में इंदिरा गांधी ने बाहरी दिल्ली के बुराड़ी गांव के पास एक फालतू पड़ी जमीन में Coronation Park बनवाया और वहां ब्रिटिश काल की सारी मूर्तियां फिकवा दीं ।

ऐसा सिर्फ दिल्ली में ही नही हुआ । पूरे देश में जहां जहां भी ब्रिटिश गुलामी के निशान थे उन्हें एक एक कर मिटाया गया । जगहों , इमारतों के नाम बदले गए , मूर्तियां हटाई गयीं ........ आप यदि पटियाला के मोती बाग palace चले जाएं तो महल के पिछवाड़े एक पार्क में Queen Elizabeth और King George के कई मूर्तियां खड़ी हैं जो कभी राजमहल के मुख्य लॉन और मुख्य द्वार पे शोभायमान थीं पर 1947 में स्वतंत्रता के बाद उखाड़ के फेंक दी गयी ।

India Gate पे वो Canopy -- छतरी जिसके नीचे वो King George पंचम की मूर्ति थी , आज भी खड़ी है ।
80 के दशक में वहां महात्मा गांधी की मूर्ति लगाने का एक प्रस्ताव संसद में विचाराधीन था जिसपे कोई निर्णय नही हुआ । मूर्ति विहीन वो छतरी आज भी खड़ी है ।

कल योगी जी ने फैज़ाबाद का नाम बदल के अयोध्या कर दिया ।
इससे पहले इलाहाबाद का नाम बदल के प्रयागराज किया था ।
सेक्युलर्स और liberals की बवासीर उभर आयी है ।

अंग्रेजी गुलामी के निशान मिटाने वाले इस्लामिक गुलामी को गंगा जमुनी तहजीब के नाम पे कैसे स्वीकार कर लेते हैं ?

Madras , Calcutta , Bombay जब चेन्नई , कोलकाता और मुम्बई हो जाते हैं तो किसी लिबरन्डू की बवासीर नही उभरती पर फैज़ाबाद और इलाहाबाद का नाम बदलने पे उभर आती है ........ क्यों ?

British गुलामी से चिढ़ने वाले Liberals को इस्लामिक गुलामी से इतना प्रेम क्यों है ?

इस्लामिक गुलामी के प्रत्येक चिन्ह को मिटाओ ।

अजित सिंह दद्दा

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